एक आँकड़ा पहले। भारत के 50-पार के तलाक़शुदा पुरुष-महिलाओं में से क़रीब दो तिहाई ने तलाक़ के पहले साल में अकेले कोई यात्रा नहीं की। यह आँकड़ा हमें कुछ बताता है — हम जोड़े के रूप में घूमने के इतने आदी हैं कि "अकेले पहाड़ जाना" एक असंभव विचार लगने लगता है।
फरवरी में कुर्ग जाइए। वहाँ अकेले होने का क्या अर्थ है, यह समझ आ जाएगा।
फरवरी ही क्यों
कुर्ग में फरवरी एक अजीब महीना है। कॉफ़ी की फ़सल कट चुकी होती है। हवा में उसकी गंध बची रहती है। मौसम ठंडा मगर बरसात नहीं। पर्यटक कम। होटल आधे भरे।
अकेले घूमने वाले के लिए आदर्श। भीड़ में अकेले होना और मुश्किल है, खाली जगह में अकेले होना शांत है।
कहाँ रुकें
कुर्ग में तीन विकल्प हैं 50+ अकेले यात्री के लिए।
- होमस्टे किसी कॉफ़ी बाग़ान में। यह सबसे अच्छा है। मेज़बान आमतौर पर पुरानी पीढ़ी के होते हैं। रात के खाने पर वे आपके साथ बैठते हैं। अकेलापन सामाजिक हो जाता है बिना मेहनत के।
- छोटा गेस्टहाउस मडिकेरी शहर में। अगर बाहर जाना न चाहो, तो शहर के बाज़ार और चर्च पैदल जाने लायक़।
- बड़े रिज़ॉर्ट से बचिए। वहाँ हनीमून जोड़े होते हैं। आप बिना कारण उदास हो सकते हैं।
पहला दिन — कुछ मत करिए
यह सबसे ज़रूरी सलाह है। पहले दिन कोई पर्यटक गतिविधि मत करिए। होमस्टे पहुँचिए, सामान रखिए, बाग़ान में टहलिए, कॉफ़ी पीजिए।
पहला दिन आपके शरीर को "मैं अकेला हूँ" की आदत डालने के लिए है। पहले कुछ घंटे अजीब लगेंगे। कोई आपसे "कैसे हो?" नहीं पूछेगा। कोई "चलो अब खाना खाने चलते हैं" नहीं कहेगा। यह असुविधा ही सीखना है।
दूसरा दिन — कॉफ़ी बाग़ान
कुर्ग के बाग़ान मालिक अक्सर छोटे-छोटे टूर देते हैं। दो-तीन घंटे में कॉफ़ी की प्रक्रिया समझाते हैं। यह जानकारी से ज़्यादा एक ध्यान है। आप देखिए कि कैसे एक बीज पेड़ से कप तक जाता है।
वहाँ पता चलता है — हर चीज़ को समय लगता है। कॉफ़ी तैयार होने में महीने, आपके टूटे रिश्ते के बाद ठीक होने में साल। बाग़ान समय की पाठशाला है।
तीसरा दिन — नदी के पास
दुबारे नदी या कावेरी नदी के पास जाइए। यह कोई विशेष प्रसिद्ध जगह नहीं, बस एक पत्थर पर बैठकर पानी देखिए। अगर आपके साथ कोई किताब है, और खोलकर दस पन्ने पढ़े बग़ैर आप पानी देखते रह गए — तो ठीक है।
तलाक़ या विधुरता के बाद अकेले होने में सबसे बड़ी उपलब्धि यह है — कुछ न करना। हमारा समाज यह करने नहीं देता।
शाम को क्या करिए
होमस्टे में शाम का खाना सबसे कठिन हो सकता है। एक टेबल पर अकेले बैठना। मेरा सुझाव — हाथ में एक किताब। या एक नोटबुक। कुछ लिखिए अगर लिखना पसंद है।
अगर मेज़बान परिवार खा रहा हो, तो उनके साथ बैठने को कहिए। कुर्ग में यह बिलकुल सामान्य है। अकेले यात्री का स्वागत है।
एक भावनात्मक चेतावनी
तीसरी या चौथी रात को शायद आप रोएँगे। किसी विशेष कारण से नहीं। बस इसलिए कि आप अकेले हैं। यह आँसू कम अकेलेपन के हैं, ज़्यादा राहत के।
पुणे कोरेगाँव के एक 56 साल के पाठक ने बताया — वे तलाक़ के एक साल बाद कुर्ग गए थे। तीसरी रात बाल्कनी पर बैठे थे, चाँद था, बाग़ान की ख़ुशबू थी, और वे अचानक रोने लगे।
"मुझे पहली बार एहसास हुआ," उन्होंने लिखा, "कि मेरी 23 साल की शादी आख़िरी कुछ साल से अकेलेपन से बदतर थी। आज पहाड़ पर अकेले होकर, मैं सच में अकेले नहीं हूँ।"
लोगों से मिलना
अकेली यात्रा का मतलब यह नहीं कि आप किसी से मिलें नहीं। होमस्टे में, कैफ़े में, ट्रेकिंग समूह में लोग मिलते हैं। बातचीत होती है, कभी-कभी नंबर बाँटे जाते हैं।
मगर अपेक्षा मत लाइए। यह यात्रा आपके लिए है, किसी को ढूँढने के लिए नहीं। अगर कोई मिल जाए, ठीक। न मिले, उससे बेहतर।
क्या ख़र्च होगा
पाँच दिन की कुर्ग यात्रा 25,000 से 40,000 रुपये में हो जाती है, इस पर निर्भर कि आप बेंगलुरु से आ रहे हैं या दिल्ली-मुंबई से। होमस्टे दिन का 2,500-4,000 रुपये लगाते हैं, खाने सहित।
वापसी पर क्या बदलेगा
मैं आपको एक बात कहती हूँ जो शायद आप तुरंत न मानें। वापसी के बाद दो हफ़्ते आपको लगेगा कि "कुछ बदला ही नहीं।" फिर तीसरे हफ़्ते अचानक किसी शाम आप घर की खिड़की पर खड़े होंगे, और महसूस करेंगे कि डर कम हुआ है।
अकेला होने का डर ही सबसे बड़ा बंधन है। कुर्ग उसे नहीं मिटाता, मगर उसे छोटा कर देता है।
अगर आप इसे पढ़ रहे हैं और सोच रहे हैं — "मैं नहीं जा सकता अकेला" — तो फ़रवरी में तीन दिन की कुर्ग यात्रा योजना बनाइए। बुकिंग कर दीजिए, जिससे पीछे न हट पाएँ। बाक़ी आसान है।